Tuesday, 21 February 2012

diary

diary  अपनी और खींचती है
जब आप उसे छोड़ के जाते हैं
और जब तक वापस आते हैं
इस अंतराल में
कुछ चैन से नहीं करने देती

सब्जी काटते वक्त, चावल पकाते वक्त, उसे बेस्वाद खाते वक्त
जाने किस चीज़ की जल्दी रहती है diary को
क्यूंकि अब जब वापस आ कर
बेहोशी भरी तीव्र गति से
पेन उठा चुकी  हूँ
कुछ भी तो नहीं लिख पा रही हूँ

मेरे दिमाक के काउंटर पर
कोई सुयोजित कतार नहीं है
बातें, चाहतें, ख़याल यूँ ही इर्द गिर्द खड़े हैं
कब किसकी पन्नों पे उतरने की बारी आये कुछ पता नहीं
कब क्या लिखूंगी अंदाजा नहीं

सोचती हूँ कितना ही लिख लूँ
कितना कुछ है जो छुट जाएगा
जिसकी बारी कभी नहीं आएगी
और जो लिखूंगी वो कहाँ अपने आप में पूरा होगा
उसका भी कुछ न कुछ हिस्सा हमेशा बच ही जायेगा




No comments:

Post a Comment

Listen To Your Stories

Listen to your heart Listen to your stories Create stories, Have kids, aren't kids great stories? What's your story? Each one...