Wednesday, 16 November 2011

सूरज


वो जलता गोला-सा सूरज
मंद होता, फीका पड़ता-सा सूरज

मैं चाहती हूँ रोक लूँ
यहीं आसमान में इसे
मैं नहीं चाहती रात हो,
फिर कल हो

मैं कहती जा रही हूँ
ये जाता जा रहा है
इसके ढलने पर मेरे कहने का
कोई जोर नहीं

मैं ऐसी ही बन जाना चाहती हूँ
एकदम सूरज जैसी

ढलता हुआ सूरज ही इतना प्यारा क्यूँ लगता है
दिन भर जब वो सिर पर खड़ा था
नज़र भर भी न देखा तुमने उसकी तरफ
फिर शाम को ही क्यूँ सब farewell party देने आ जाते हैं
दिन चाहे कितना ही सुहावना रहा हो
हम बैठे सूरज को नहीं निहारते

फिर वही सूरज जब शाम को ढलने लगता है
सब आनंद लेकर उसे विदा करते हैं
जाती हुई चीज़ को देखकर
कैसे प्रेम उमड़ता है मन में

हर वो चीज़ जो पैदा हुई है, उसे ख़त्म होना है
मैं भी उन में से एक हूँ, यह सूरज, ये चाँद भी

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