Saturday, 20 October 2012

ऊन उधेड़े, छंद बिखेरे

रात करे बात, हिसाब मांगे मिजाज़ 
धुन लपेटे, बुने-उधेड़े 
ऊन उधेड़े, छंद बिखेरे 

जिक्र आया, फ़िक्र आई 
बंद गला, इंग्लिश टाई 
ऊन उधेड़े, छंद बिखेरे 

अखबार श्रीमान , खबर बेईमान 
सच है बेकार, झूठ है असरदार 
क्या करे बेचारा, बेबसी का मारा 
ऊन  उधेड़े, छंद बिखेरे  

कुर्सी, मेज़, होते हैं पूरक 
सैयां रंगरेज़, जाने न मुरख 
आदत का मारा, दिल बेचारा 
ऊन  उधेड़े, छंद बिखेरे   

टोटकों में डूबा, चमत्कार ढूँढता 
चिलम, अफीम के नशे में, भगवान् ढूँढता 
मस्त फिर भी दिल मग्न 
ऊन  उधेड़े, छंद बिखेरे   



4 comments:

  1. अच्छी लगी यह कविता। मुझे लगा आपने मेरी पोस्ट को पढ़कर लिखा है। मैने इसे ऐसे पढ़ा....

    ऊन उधेड़े, छंद बिखेरे

    रात करे बात
    हिसाब मांगे मिजाज़
    धुन लपेटे
    बुने-उधेड़े

    जिक्र आया
    फ़िक्र आई
    बंद गला
    इंग्लिश टाई

    अखबार श्रीमान
    खबर बेईमान
    सच है बेकार
    झूठ है असरदार
    क्या करे बेचारा
    बेबसी का मारा

    कुर्सी-मेज़
    होते हैं पूरक
    सैयां रंगरेज़
    जाने न मुरख
    आदत का मारा
    दिल बेचारा

    टोटकों में डूबा
    चमत्कार ढूँढता
    चिलम, अफीम के नशे में
    भगवान् ढूँढता
    मस्त फिर भी दिल मगन
    ऊन उधेड़े, छंद बिखेरे।

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  2. :)jee bilkul, kyunki likhne se just pehle maine aapki woh latest post padhi thi, yeh cheez maine bhi realize nahi ki thi, aapke abhi mention karne pe vapas se jaa ke dekha to yaad aaya, bilkul, beshak, asar hai aapki post ka :)

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  3. aapki panktiyan bhi itni hi khoobsoorat hain jitni aapki photo...us par gaur farmane ki gustakhi ke liye maaf kijiyega

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    1. kisi ne aapko kaha hai ki hum ek se hi dikhte hain?? didi :)

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